19 साल पहले 9/11 को उस समय दुनिया बदल गई थी, जब 19 अरबी अपहर्ताओं ने चार हवाई जहाजों को न्यूयॉर्क में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और वॉशिंगटन में पेंटागन से टकरा दिया था। एक अकेले आतंकी हमले में 2977 लोगों की मौत हो गई थी। अमेरिका ने अफगानिस्तान से लेकर इराक तक आतंकवाद के खिलाफ युद्ध शुरू कर दिया और सिर्फ 2002 में ही 59 अरब डॉलर खर्च कर दिए। आतंक के खिलाफ अमेरिका खर्च 2020 में 109 अरब हो गया, लेकिन दुनिया आज भी सुरक्षित नहीं है। इस साल दुनिया एक और खतरनाक हमले का सामना कर रही है। यह अलकायदा या आईएआईएस से नहीं, बल्कि काेरोना वायरस से है। कोरोना वायरस के हमले ने एक बार फिर पूरी दुनिया को बदल दिया है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अन्य दक्षिण एशियाई देशों में मार्च के आखिर तक मौतों की संख्या बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन बीमारों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी चिंताजनक है। यह समझना कठिन नहीं है कि दक्षिण एशिया की दोनों परमाणु शक्तियां इस हमले को रोकने में क्यों नाकाम रहीं? हां, भारत और पाकिस्तान दाेनों के पास लोगों को मारने और शहरों को मिटाने वाले परमाणु हथियार हैं, लेकिन कोरोना को मिटाने वाली वैक्सीन नहीं है। यही स्थिति दुनिया के एकमात्र सुपर पॉवर की भी है।
चीन पिछले कुछ सालों से अमेरिका की आर्थिक ताकत को चुनौती देने की आक्रामक कोशिश कर रहा था, लेकिन कोरोना ने अमेरिका और चीन दाेनों की ताकत पर सवाल खड़े कर दिए हैं। चीन ने कोविड-19 को रोकने के लिए सिर्फ लाॅकडाउन का समाधान निकाला और अब अमेरिका से लेकर भारत तक इसी मॉडल को लागू कर रहे हैं। तथ्य यह है कि अमेरिकी और चीनी वैज्ञानिक दुनिया को कोरोना वायरस के बढ़ते खतरे के प्रति 2007 से ही आगाह कर रहे थे, लेकिन किसी ने भी सुना नहीं। 13 साल पहले अक्टूबर 2007 में ‘क्लिनिकल माइक्रोबायोलॉजी रिव्यू’ द्वारा प्रकाशित अध्ययन में कहा गया था कि चीन गंभीर वायरस आपदा के ‘टाइम बम’ पर बैठा है। अमेरिकी सोसायटी फॉर माइक्रोबायोलॉजी द्वारा प्रकाशित इस जर्नल में प्रकाशित यह चेतावनी हांगकांग के विश्वविद्यालयों के साथ काम कर रहे चार वैज्ञानिकों ने लिखी थी। इनमें से एक क्वोक यंग युएन एक चीनी थे और उन्होंने अधिकतर जानकारी अपने चीनी सूत्रों से एकत्र की थी। उन्हांेने दक्षिण चीन में अजीब स्तनपायियाें खासकर हॉर्सशू चमगादड़ खाने की आदतों को टाइम बम कहा था। उन्हांेने सार्स के दाेबारा उभरने और अन्य खतरनाक वायरसों की आशंका व्यक्त की थी।
अमेरिकी थिंक टैंक रैंड कॉर्पोरेशन ने पुन: 2012 में चेताया कि अमेरिका को आतंकवाद से अधिक खतरा महामारी से है, लेकिन इसे भी अमेरिका के नीति निर्धारकों ने नजरअंदाज कर दिया। वे आतंकवाद से लड़ाई पर जहां 100 अरब डॉलर हर साल खर्च कर रहे थे, लेकिन महामारी से लड़ने के लिए उनका बजट एक अरब डॉलर था। 2015 में बिल गेट्स ने भी ऐसी चेतावनी दी थी। बराक ओबामा की आंतरिक सुरक्षा सलाहकार लिसा मोनाको ने इस पर कुछ काम शुरू भी किया था, लेकिन इस बीच ट्रम्प राष्ट्रपति बन गए। अमेरिका की पत्रिका अटलांटिक ने 2018 में इन्फ्लुएंजा के साथ ‘अगले प्लेग’ के प्रति चेताया था। 2019 में अमेरिका के जॉन हॉपकिंस सेंटर फॉर हेल्थ सिक्योरिटी ने भी चीन से वायरस आने के प्रति चेताया था, लेकिन ट्रम्प प्रशासन ने इसे नजरअंदाज कर दिया। यहां विशेषज्ञों ने बजट को एक अरब डॉलर से बढ़ाने की मांग की थी। ट्रम्प ने सोचा कि इसकी कीमत तो सिर्फ चीन ही चुकाएगा। मेरी नजर में इसके लिए चीन व अमेरिका दोनों जिम्मेदार हैं।
चीन अपने दंभ के लिए इस वायरस का जनक बन गया और अमेरिका ने वैज्ञानिकों की राय नहीं मानी। इस आउटब्रेक के बाद अमेरिका ने अपनी अर्थव्यवस्था में दो ट्रिलियन डॉलर डाले हैं, लेकिन भारत व पाकिस्तान के पास आने वाले समय में अपने देशों को आर्थिक महामारी से बचाने के लिए पर्याप्त धन नहीं है। भारत और पाकिस्तान ने एक मजबूत हेल्थ केयर ढांचा खड़ा करने की बजाय हथियार खरीदने में ज्यादा खर्च किया है। अब हमें इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। यह समय है, जब हमें एक-दूसरे से लड़ने की बजाय मिलकर कोरोना से लड़ना चाहिए। मैं जानता हूं कि मेरे लिए यह लिखना आसान है कि लड़ना बंद करें, लेकिन हमारे नेताओं के लिए लड़ाई राेकना कठिन है। असल में उनके अहंकार हमारी साझी समस्याओं से बड़े हैं। इसलिए चलो उन्हें एक-दूसरे को गाली देने दो, लेकिन कम से कम चुपके से रक्षा बजट में कटौती करके उस धन को हेल्थ केयर मंे लगा दो। अमेरिकी और चीनी अर्थव्यवस्थाएं तो अपने परमाणु बमों के साथ उबर जाएंगी, लेकिन भारत और पाकिस्तान की अर्थव्यवस्थाओं को आने वाले हफ्तों, महीनों में ही मुसीबत का सामना करने को तैयार रहना चाहिए। सबसे खराब समय तो आना बाकी है। हमें जागने की जरूरत है, क्योंकि अगले नौ महीनों में लाखों लोगों की मौत हो सकती है। भारत व पाकिस्तान में लाखों लोग कोविड-19 से नहीं गरीबी और भुखमरी से मरेंगे।(यह लेखक के अपने विचार हैं।)
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