लेटिन अमेरिकी जंगल में एक व्यक्ति पेड़-पौधों को देखते हुए बहुत दूर चला गया। उसे तीव्र बुखार आ गया। उसे वापसी का मार्ग नहीं मिल रहा था। भटकते हुए वह एक तलैया के पास पहुंचा। अगर यह तलैया बंगाल में होती तो इसे पोखर कहते। तीव्र ज्वर में तपते हुए व्यक्ति ने तलैया का जल पिया। उसे महसूस हुआ कि उसका ज्वर कम हुआ है। जैसे-जैसे वह पानी पीता गया, वैसे-वैसे उसका ज्वर कम होता गया। उस व्यक्ति ने देखा कि तलैया के आसपास बहुत से वृक्ष हैं, जिनके पत्ते तलैया में गिर रहे हैं। इसी के साथ वृक्ष की सूखी छाल भी पानी में गिर रही है। कालांतर में वृक्षों की छाल से ही कुनैन नामक दवा का निर्माण हुआ और अनगिनत लोगों के प्राण कुनैन खाने से बचे। क्लोरो कुनैन भी बनाई गई। मलेरिया के इलाज में क्लोरो कुनैन बहुत फायदेमंद साबित हुई। आज कुछ लोग कोरोना से पीड़ित व्यक्ति को क्लोरो कुनैन खाने की सलाह दे रहे हैं, परंतु यह कोरोना का इलाज नहीं है।
वृक्ष की छाल से बनी कुनैन बहुत कड़वी होती है। अत: उसे शक्कर में लपेटकर दिया जाता है। शुगर कोटेड कुनैन की तरह कुछ कड़े कदम उठाए जाते हैं। मसलन कर्फ्यू में दो घंटे की छूट दी जाती है। घरों में ही बने रहना कोरोना को फैलने से रोक सकता है। इस बंदिश को भी ‘शुगर कोटिंग’ कहा जा सकता है। यहां तक कि भाषा में ‘शुगर कोटेड’ मुहावरा बन गया।
इसी तरह क्षय रोग ने भी अनगिनत लोगों के प्राण लिए हैं। सन् 1943 में स्ट्रेप्टोमाइसिन की खोज हुई। क्षय रोग का इलाज इस दवा से किया गया। खाकसार की मां को 1939 में क्षय रोग हुआ था। उन्हें पौष्टिक खाना दिया गया। सुबह-शाम अंडे खिलाए गए। मांसाहार भी दिया गया। इस तरह बिना किसी दवाई के क्षयरोग पर विजय प्राप्त की गई। खाने-पीने की चीजों में मिलावट करने वालों को कड़ी सजा दी जानी चाहिए। कुछ लोग सजा ए मौत भी तजवीज करते हैं। एक दौर में 94 लाख लोगों को क्षयरोग रहा है। ज्ञातव्य है कि पंडित नेहरू की पत्नी कमलादेवी का निधन भी क्षय रोग के कारण हुआ था। सन् 1928 में अलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने पेनिसिलिन की खोज की थी और स्ट्रेप्टोमाइसिन सन् 1943 में खोजी गई। विदेशों में सभी रोगों पर फिल्में बनती रही हैं। राज कपूर की फिल्म ‘आह’ का नायक एक इंजीनियर है। वह एक बांध के निर्माण में लगा है। लंबे समय तक वह शहर से दूर रहता है। उसके माता-पिता उसका विवाहकरना चाहते हैं। जिस कन्या से उसका विवाह होना है, उसे पत्र लिखने की इजाजत दी जातीहै। लेकिन उस युवती की कोई रुचि पत्र लिखने में नहीं है। वह अपनी छोटी बहन को पत्रलिखने के लिए कहती है। इस तरह एक प्रेमकथा पत्राचार द्वारा विकसित होती है। ज्ञातव्य है कि ‘आह’ को राज कपूर के सहायक राजा नवाथे ने डायरेक्ट किया था।
संजीव कुमार अभिनीत फिल्म ‘जिंदगी’ में एक गरीब व्यक्ति अपने परिश्रम और बुद्धि से एक बड़ा उद्योग समूह खड़ा कर देता है। अपने औद्योगिक साम्राज्य पर निगाह रखने के लिए उसे बहुत परिश्रम करना पड़ता है। इस तरह वह अपने गढ़े हुए साम्राज्य का गुलाम बन जाता है। उसे कई रोग हो जाते हैं। सुबह, दोपहर और शाम उसे भांति-भांति की दवाएं लेनी होती हैं। गोयाकि भोजन से अधिक मात्रा में वह दवाओं का सेवन करता है। दवा खाने से अजीज आ चुका है। फिल्म के कुछ दृश्यों में बताया गया है कि वह एकांत में श्री कृष्ण भगवान से बात करता है। एक दृश्य में वह कैप्सूल फेंक देता है। श्री कृष्ण मुस्कुराते हुए कहते हैं- यह क्लोरोमाइसिन और ढमका माइसिन, दरअसल तेरे अपने द्वारा किए गए ‘सिन’ (अपराध) हैं जो तूने धनाढ्य बनने के लिए किए हैं।
पेड़-पौधे, वृक्ष, ताल, तलैया सभी में कुछ जीवन रक्षक बातें हैं। अंधे विकास ने जंगल नष्ट कर दिए हैं। युद्ध स्तर पर नागरिकों द्वारा पौधारोपण की एक रास्ता है। हर आंगन में तुलसी लगाना आवश्यक है। निदा फाजली की कविता है-
धूप तो धूप है,
उसे शिकायत कैसी
अबकी बरसात में कुछ पेड़ लगाना साहब
नदिया ऊपर पुल बनाना
जुड़ा नगर से गांव
चिड़िया गूंगी हो गई
अंधी हो गई छांव...।
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