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स्वास्थ्य सेवाओं को स्वच्छता की तरह आंदोलन बनाएं मोदी

मैंने जब 2013 में नरेंद्र मोदी के पक्ष में लिखना शुरू किया तो यह मेरे सेकुलर दोस्तों को बर्दाश्त नहीं हुआ। वे कहते थे आप कैसे किसी ऐसे व्यक्ति की प्रशंसा कर सकती हो, जिसके राज में 2002 के दंगे हुए थे। वो प्रधानमंत्री बन जाते हैं तो देशभर में दंगे हो सकते हैं। मेरा जवाब होता था कि मैंने कई सेकुलर प्रधानमंत्रियों और मुख्यमंत्रियों के दौर में कई बार दंगे देखे हैं। लेकिन, उनको हमने कभी इतना बदनाम नहीं किया, जितना मोदी को बदनाम किया है। क्या 1984 में राजीव गांधी के कार्यकाल के शुरू होते ही 3000 सिख दिल्ली के नरसंहार में नहीं मारे गए थे? क्या यह सच नहीं है कि राजीव इसके बावजूद बोफ़ोर्स घोटाला होने तक हमारे लिए एक चमकता सितारा नहीं थे। राजीव को कभी अमेरिका ने वीजा देने से इनकार नहीं किया, क्योंकि हम पत्रकारों ने उनकी छवि कलंकित होने से बचाकर रखी थी। मैं उस समय यह भी कहती थी कि कांग्रेस ने अपने दशकों लंबे राज में कभी गरीबी हटाने की कोशिश ईमानदारी से नहीं की है। ईमानदारी से की होती तो गरीबों के हाथ में वह औजार दिए होते जिससे गरीबी दूर हुई है, अन्य देशों में जैसे- बेहतरीन शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं। हमारे देश में गरीबी हटाने के नाम पर मनरेगा जैसी योजनाओं द्वारा सिर्फ खैरात बांटी गई है। अच्छे स्कूल और अस्पताल आम नागरिक को कभी नहीं दिए गए। दरअसल, जिन लोगों को इन आम सेवाओं के निर्माण का काम सौंपा गया था, उन्होंने कभी न तो अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाने की जरूरत महसूस की और न ही किसी परिजन का इलाज सरकारी अस्पतालों में करवाने की। मुझे मोदी पर विश्वास था कि वह जब परिवर्तन लाने की बातें करते थे तो इन क्षेत्रों में परिवर्तन जरूर लाकर दिखाएंगे। माना कि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है, लेकिन मोदी के दौर में कभी वो समय भी रहा है जब सभी बड़े राज्यों में उनके मुख्यमंत्री थे। जिस तरह स्वच्छ भारत आंदोलन मुख्यमंत्रियों के जरिये युद्धस्तर पर सफल बनाया था, उसी तरह स्कूल और अस्पताल भी सुधारे जा सकते थे। ऐसा उन्होंने नहीं किया और आज हम इसका खमियाजा भुगत रहे हैं।
कोरोना महामारी के इलाज के लिए खास अस्पतालों की जरूरत है। लेकिन, जब हमारे आम सरकारी अस्पताल ही इतने बेकार हैं कि गरीब भारतीय भी प्राइवेट में इलाज करवाने पर मजबूर है, तो कहां से आएंगे वह खास कोरोना अस्पताल? कोरोना के गंभीर मरीजों के लिए वेंटिलेटर जरूरी हैं, क्योंकि इस बीमारी के कारण फेफड़े फूल जाते हैं। करोना मरीजों का जो डॉक्टर और नर्स इलाज कर रहे हैं, उनके लिए खास लिबास, मास्क और गॉगल्स जरूरी हैं, ताकि वे खुद बीमार न हो जाएं। जब विकसित पश्चिमी देशों में इन चीजों का अभाव दिखने लगा है तो हमारे इस गरीब, बेहाल देश में कहां से आएंगी यह चीजें? प्रधानमंत्री ने जब 14 अप्रैल को देशवासियों को संबोधित किया था तो उन्होंने आश्वासन दिया कि कोविड-19 को हराने के लिए देश तैयार है। लेकिन, यह नहीं बताया कि इस तैयारी में नए कोरोना अस्पताल कितने बने हैं, क्या उनमें हर बिस्तर के साथ वेंटिलेटर और ऑक्सीजन देने की सुविधाएं हैं कि नहीं।
उनकी सरकार की लॉकडाउन की तैयारी इतनी कच्ची थी कि उन्होंने मजदूरों के पलायन की भी तैयारी नहीं की थी। अगर आप मज़दूरों को अपने गांव जाने से रोकना चाहते हैं तो कम से कम उनके रहने और खाने का पूरा प्रबंध पहले से किया जाना चाहिए था। माना कि पहले लॉकडाउन में कुछ गलतियां हो गई थीं, तो कम से कम दूसरे लॉकडाउन में मुंबई, दिल्ली, सूरत और हैदराबाद जैसे बड़े शहरों से मजदूरों के पलायन को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए थे? उनका घर जाना ख़तरनाक है, क्योंकि वे वायरस को अपने साथ ले जा सकते हैं। अगर यह महामारी ग्रामीण क्षेत्रों में फैलने लगती है तो यहां लाखों की तादाद में लोग मर सकते हैं। रही बात शिक्षा की तो यह भी कहना होगा कि अगर हमारे सरकारी स्कूल अच्छे होते तो उनमें साक्षरता के बदले शिक्षा मिलती। आम लोग शिक्षित होते तो उनको मज़दूरी नहीं अच्छी नौकरियां मिलतीं। वे झुग्गियों में नहीं अच्छे घरों में रहते जहां सोशल डिस्टेंसिंग आसान होता है। जब 80 फीसदी देशवासियों का आवास एक कमरा हो तो सोशल डिस्टेंसिंग करने की सलाह देना क्या उनके ज़ख्मों पर नमक छिड़कने के समान नहीं है?
मायूसी और मंदी के इस दौर में अगर इस महामारी से कुछ अच्छा हो सकता है तो वह सिर्फ़ यह है कि मोदी जैसा लोकप्रिय राजनेता अब स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार लाने पर विशेष ध्यान लगा दे। ऐसा करना मुश्किल नहीं है, क्योंकि विश्व के सबसे अच्छे प्राइवेट अस्पताल और डॉक्टर भारत में हैं। उनकी मदद से हमारे सरकारी अस्पतालों में भी सुधार लाया जा सकता है। अभी तक प्रधानमंत्री से हमने सिर्फ़ आदेश सुने हैं कि हमें कैसे बचना है कोरोना से। क्या उम्मीद कर सकते हैं कि अपने अगले भाषण में प्रधानमंत्री हमें बताएंगे कि उनकी सरकार हमारे लिए क्या कर रही है? क्या उम्मीद कर सकते हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने के लिए वह कम से कम उतना ध्यान देंगे, जो उन्होंने स्वच्छ भारत आंदोलन को दिया था?
(यह लेखिका के अपने विचार हैं।)



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Modi should make health services a movement like cleanliness


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