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लॉकडाउन का फैसला किसे बचाएं, किसे नहीं पर निर्भर

लॉकडाउन के बीच टेलीविजन पर एक गरीब प्रवासी श्रमिक को यह कहते सुना- ‘अगर कोरोना मुझे नहीं मारता है तो बेरोजगारी और भूख मार डालेगी’। असल में उसने सरकार के सामने उपलब्ध कठिन विकल्पों को अभिव्यक्त किया था कि ‘किसे जीना चाहिए और किसे मर जाना चाहिए?’ इस दुविधा का हल ही 4 मई को लॉकडाउन खत्म होना तय करेगा। क्या हमें आज कोविड-19 से एक जिंदगी बचानी चाहिए, लेकिन इससे कहीं अधिक जिंदगियों को लॉकडाउन मंें व्यापक बेरोजगारी, भूख और कुपोषण से जोखिम में डाल देना चाहिए? यह एक गंभीर धर्मसंकट है।
अगर भारत लॉकडाउन के जरिये मौतें रोकने में सफल हो भी जाता है तो भी जब तक वैक्सीन नहीं आ जाती, कोरोना वायरस फैलता रहेगा। इसमें कई महीने या साल भी लग सकते हैं। लॉकडाउन भारी बेरोजगारी और मंदी को पैदा करेगा। इससे सर्वाधिक प्रभावित 40 करोड़ दैनिक वेतनभोगी होंगे अौर उनमें से कई की भूख से मौत हो सकती है। लॉकडाउन में कल्याण पैकेज की वजह से सरकार का खजाना नष्ट हो जाएगा, जो मंदी की वजह से पहले ही बहुत कमजोर है। यह महामारी भारत को कई दशक पीछे ले जाएगी। भारत एक बहुत ही गरीब देश बन सकता है।
इसी वजह से अमेरिका के कुछ राज्यों और स्वीडन ने लाॅकडाउन न करने का फैसला लिया, क्योंकि उन्होंने महसूस किया कि यह इलाज बीमारी से भी खराब था। टेक्सास के ले. गवर्नर ने इस धर्मसंकट के एक और पहलू को उभार दिया। उन्होंने कहा कि इस वायरस से सबसे अधिक खतरा बुजुर्गों को है, उन्हें इस आधार पर युवाओं के लिए मरने को तैयार रहना चाहिए, क्योंकि उन्होंने एक पूरी जिंदगी जी ली है, जबकि युवाओं के पास पूरा जीवन बाकी है। उन्होंने लॉकडाउन नहीं किया और आर्थिक गतिविधियों काे चलने दिया। हमारी नैतिक बुद्धि इस धर्मसंकट को हल करने के बारे में क्या कहती है?

इसका कोई आसान जवाब नहीं है, क्योंकि दोनों ही विकल्प खराब हैं। हम लोगों को वायरस से भी बचाना चाहते हैं, लेकिन हम बचे लोगों को भूख और गरीबी की जिंदगी का दंड भी नहीं दे सकते। महाभारत में ऐसी स्थिति के बारे में विदुर कहते हैं कि वे एक गांव को बचाने के लिए एक व्यक्ति और एक देश को बचाने के लिए एक गांव की बलि दे सकते हैं। कहने का आशय यह है कि अगर बीमारी की तुलना में लाॅकडाउन से अधिक जानें जा रही हों तो वह लॉकडाउन को हटा देते।

पहली नजर में मैं विदुर से सहमत दिखता हूं, क्योंकि लॉकडाउन की वजह से वायरस से लाखों जानें बच सकती हैं, लेकिन यह करोड़ों को ऐसी जिंदगी में धकेल सकता है, जो रहने लायक न हो। लेकिन, जब मैं दुविधा को व्यक्तिगत करता हूं कि क्या होगा अगर लाॅकडाउन हटने से मेरे बेटे की मौत हो सकती हो? क्या मैं अपने बेटे को कोविड से मरने के लिए छोड़ सकता हूं? मेरी नैतिक बुद्धि स्पष्ट है- मैं अपने बेटे को बचाने के लिए 4 मई के बाद भी लाॅकडाउन को जारी रखना चुनूं्गा। इस तरह से मैं आज की जिंदगी बचाने को प्राथमिकता दूंगा और भविष्य की जिंदगियांे की चिंता नहीं करूंगा। राजधर्म और व्यक्तिगत धर्म का यही अंतर है।
इसलिए राज्य सरकारें मध्य मार्ग पर चलते हुए 4 मई के बाद लॉकडाउन को जांच के परिणामों और संक्रमण की दर के आधार पर चयनित इलाकों में खोलेंगी, ताकि बीमारी से जनहानि को न्यूनतम करने के साथ ही आर्थिक नुकसान और बेराेजगारी में भी कमी की जा सके। मेरा अनुमान है कि 65 साल से अधिक के लोग लॉकडाउन में ही रहेंगे। देश को जाेन में बांटकर, रेड जोन यानी हॉटस्पॉट में लॉकडाउन जारी रहेगा। कार्यस्थल और जन परिवहन में मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग अनिवार्य होगी।
भविष्य का अनुमान लगाना कठिन है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि मई मध्य में संक्रमण तेज हो सकता है। इसका मतलब एक और लॉकडाउन होगा। सरकार को पहले की गलतियों से सीखना चाहिए। 1. लोगों को तैयारी के लिए समय दें। 2. प्रवासी मजदूरों के रहने और खाने की बेहतर व्यवस्था हो। 3. एमएसएमई को पैकेज के जरिये कर्मचारियों के वेतन का प्रावधान हो। 4. पुलिस को पास जारी करने के लिए कहकर लाइसेंसराज न कायम करें, लोगों को स्वतंत्र रूप से घूमने की अनुमति हो, लेकिन उन्हें दंडित करें जो नियम तोड़ें।

आने वाले समय में कई दुविधाएं उत्पन्न होंगी, जैसे एक आईसीयू बेड, दो मरीज किसे दें? एक 20 साल का, दूसरा 50 का किसे दें? अगर मुझे तय करना हो तो मैं पहले आओ पहले पाओ या लॉटरी से फैसला करूंगा। संकट के बाद दूसरी तरह की भी दुविधा होगी। आज एप के माध्यम से संक्रमित लोगों की निगरानी हो रही है, लेकिन बाद में हम सरकार को यह ताकत नहीं देना चाहेंगे। लोग संकट खत्म होने के बाद कैसे अपनी निजता सुरक्षित रखेंगे? इस न दिखने वाले वायरस से उत्पन्न नैतिक दुविधाओं पर हमारे नेता कैसे प्रतिक्रिया करते हैं और कितनी जान बचाते हैं यह हमारे देश के मूल्यों को प्रबिंबित करेगा। इसलिए जरूरी है कि हम अपने मूल्यों की रक्षा पर उचित प्रतिक्रिया दें।
(यह लेखक के अपने विचार हैं।)



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The decision to lockdown depends on whom to save, not whom


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