चीन से टेस्टिंग किट खरीदने पर व्यर्थ हुए समय आैर धन को लेकर मचे बवाल ने सरकार और उसकी प्रिय एजंेसी भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के स्तर पर नीति और निर्णय लेने में गंभीर विफलता की ओर इशारा किया है। इन किटों की सफलता दर महज पांच फीसदी है। इसी सप्ताह देश की इस सर्वोच्च बायोमेडिकल रिसर्च एजेंसी ने टेस्ट के परिणामों में व्यापक अंतर होने की बात स्वीकारते हुए इससे कोविड-19 की टेस्टिंग पर रोक लगा दी है। इस पूरे प्रकरण ने कोविड-19 के प्रबंधन में सरकार की गंभीर लापरवाही को उजागर किया है। मुझ जैसे जिन विपक्षी नेताओं ने इस मामले को उठाया, उन्हेें सरकार के समर्थकों के गुस्से से दो-चार होना पड़ा। उनका कहना है कि ‘मोदी सरकार इसके बारे में क्या कर सकती थी? कई अन्य देशों का भी ऐसा ही अनुभव है।’ उनकी दूसरी प्रतिक्रिया है- ‘सरकार के पास और विकल्प ही क्या थे? कांग्रेस रैपिड टेस्ट की मांग कर रही थी, लोग और विशेषज्ञ भी इसी पर जोर दे रहे थे।’ इस सभी आपत्तियों को पलटने का मुझे मौका दें। पहली आपत्ति का जवाब है कि यह बात सही है। लेकिन, कोई सरकार दूसरों की गलती से नहीं सीखती तो वह कितनी होशियार है? क्या यह सरकार की बेवकूफी नहीं है कि उसने यह जानते हुए भी कि यह गलत है, वही गलती की जो दूसरे कर रहे थे। ऐसे समय पर जब व्यापक रूप से यह माना जा रहा है कि टेस्टिंग बहुत जरूरी है, तब चीनी किटों की दुनियाभर में आलोचना हुई है।
इस बीमारी की रोकथाम के लिए यूरोप व अमेरिका की मेडिकल एजेंसियों के मुताबिक टेस्ट किट कम से कम 80 फीसदी सटीक होनी चाहिए, लेकिन चीनी किट बुरी तरह से विफल रहीं। भारत के ऑर्डर देने से पहले ही ये चेक गणराज्य में 30 फीसदी, स्पेन व तुर्की में 35 फीसदी और फिलीपींस में 40 फीसदी ही सही परिणाम दे रही थीं। भारत में तो यह स्तर पांच फीसदी ही रहा। कोरोना से बुरी तरह प्रभावित स्पेन ने चीन के उत्पादक शेनझेन बायोइजी टेक्नोलॉजी को करीब 6 लाख किट वापस की थीं। इटली और नीदरलैंड ने चीनी किटोंसे जांच बंद कर दी थी। चीनी किटांे के खराब प्रदर्शन से नाराज ब्रिटेन ने चीनी कंपनियों से दो करोड़ डॉलर का रिफंड मांगा है।
निश्चित ही चीनी प्रवक्ता दावा करते रहे कि अगर अधिकृत उत्पादक से खरीदी जाती हैं तो उनकी किट सही हैं और भारत को दी गईं किट ‘वेरिफाइड’ है। चीनी दूतावास के प्रवक्ता जी रोंग ने दावा किया कि चीन निर्यात किए जाने वाले मेडिकल उत्पादों की गुणवत्ता को बहुत महत्व देता है। लेकिन, भारत ने गुआंगझोउ की जिस वोंडफो को ऑर्डर दिया, उसके साथ ही ब्रिटेन का अनुभव खराब था। क्या यह मूर्खता या सांठगांठ या इससे भी खराब को नहीं दर्शाता? इस फैसले के बारे में कोई भी शब्द कहना कठिन है। सरकार के बचाव में एक तर्क यह हो सकता है कि ऑर्डर विदेशों से आने वाली खराब जानकारी से पहले ही दे दिया गया था, फिर इसे रद्द क्यों नहीं किया गया?
सरकार के सहायकों का दूसरा तर्क कि कोई विकल्प नहीं था, स्वीकार करने योग्य नहीं है। विकल्प थे। इसका जवाब स्वदेशी किट बनाना था, जैसे अमेरिका, साउथ कोरिया और जर्मनी ने किया। भारतीय भी ऐसा करने में सक्षम हैं। असल में मेरे खुद के लोकसभा क्षेत्र तिरुवनंतपुरम में प्रतिष्ठित संस्थानों ने दो सफल पहल कीं, वहां का सांसद होने की वजह से मैं उनसे करीब से जुड़ा रहा। श्री चित्र तिरुनल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंस एंड टेक्नोलॉजी (एससीटीआईएमएसटी) का आरटी-एलएएमपी टेस्ट एक निर्णायक और तेज होने के साथ ही मौजूदा आरटी-पीसीआर टेस्ट की तुलना में सस्ता भी है और राजीव गांधी सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी (आरजीसीबी) की रैपिड टेस्ट किट (जो चीन जैसी ही है), दोनों ही हफ्तों पहले सभी तरह की औपचारिकताएं पूर्ण किए जाने के बावजूद आईसीएमआर की स्वीकृति का इंतजार कर रही हैं।
मैंने प्रधानमंत्री द्वारा सांसद निधि पर रोक लगाने से ठीक पहले 30 मार्च को एससीटीआईएमएसटी को एक करोड़ की फंडिंग की थी। उसके बाद एससीटीआईएमएसटी ने बहुत तेज काम किया। उसने अनुसंधान और विकास पूरा किया, अपने उत्पाद की जांच की और ट्रायल में सौ फीसदी सही परिणाम हासिल किए। लेकिन आईसीएमआर का प्रमाण-पत्र नहीं मिलने से इसका बड़े पैमाने पर निर्माण शुरू नहीं हो सका है। यही मामला आरजीसीबी के साथ है। इसी बीच, दक्षिण कोरिया की कंपनी एसडी बायोसेंसर ने भारत में रैपिड टेस्टिंग किट का निर्माण शुरू कर दिया है और उसकी क्षमता हर सप्ताह पांच लाख किट बनाने की है। एससीटीआईएमएसटी व आरजीसीबी के उत्पाद और अब एसडी बायोसेंसर समेत सरकार के पास स्थानीय विकल्पों की कमी नहीं है। जब दुनिया में चीन की सरकार और उसके उत्पादों पर संदेह बढ़ रहा है, तब सरकार ने चीन से खराब किट क्यों खरीदी? टेलीविजन के एक शोमैन के शब्दों में ‘द नेशन वांट्स टू नो’।
(यह लेखक के अपने विचार हैं।)
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