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प्रतिभा का अंक गणित, बीज गणित और रेखा गणित, इसी ने शकुंतला देवी को ताउम्र असाधारण बनाए रखा

प्राय:आम आदमी विवाद से बचने के लिए साधारण बने रहना चाहते हैं या कम से कम साधारण होने का स्वांग करते हैं। प्रतिभाशाली शकुंतला देवी ताउम्र असाधारण बनी रहीं और इसे उन्होंने खूब प्रचारित भी किया। संभवत: शकुंतला देवी जीवन के शोर भरे सन्नाटे को समझती थीं व खूब आनंद लेती थीं।

वे प्राय: यह दिखाती रहीं, मानों वे लोकप्रियता से भागने का जतन कर रही हैं। वह यह प्रस्तुत करने में भी सफल रहीं कि लोकप्रियता से भागने के जितने प्रयास करती हैं, उतनी अधिक लोकप्रिय होती रहीं। शकुंतला देवी को मनुष्य कंप्यूटर कहा गया। वह पलक झपकने से कम समय में अंक गणित के जटिल प्रश्न का उत्तर बता देती हैं। अत: उन्हें अमेरिका, इंग्लैंड व यूरोप के देशों में निमंत्रित किया गया।

प्रदर्शन में कंप्यूटर ने गलती कर दी, शकुंतला ने सही जवाब दिया

एक प्रदर्शन में उनका दिया गया उत्तर कंप्यूटर के उत्तर से अलग था। शकुंतला देवी ने कहा कंप्यूटर से गलती हुई है। गहरी छानबीन के बाद शकुंतला देवी सही थीं, मनुष्य कंप्यूटर बनाता है व कंप्यूटर द्वारा बनाए रोबो भी गफलत कर जाते हैं। फिल्मकार अन्नू मेनन ने अपनी फिल्म ‘शकुंतला देवी’ में मां, बेटी और नानी के घुमावदार रिश्ते को प्रस्तुत किया है।

यही फिल्म को मानवीय संवेदना का दस्तावेज बन देता है। शकुंतला देवी अपनी मां को समझ नहीं पाईं, क्योंकि मां में रहने वाली स्त्री को उसने अनदेखा किया। कालांतर में स्वयं शकुंतला देवी की बेटी ने अपनी मां के स्त्री स्वरूप को अनदेखा किया व रिश्तों की भूलभुलैय्या में वे सब लोग भी उलझ जाते हैं, जो इनके संपर्क में आते हैं। उन्होंने देश-विदेश में प्रदर्शन करके अकूत धन कमाया व बंगले खरीदे। एक दौर में उनकी पुत्री बंगला खरीदकर उसे साज-संवारकर महंगे दामों मे बेचने लगी।

एमेडस मोजार्ट बचपन में ही मौलिक संगीत रचने लगे थे

ज्ञातव्य है कि एमेडस मोजार्ट ने बचपन में ही मौलिक संगीत रचने लगे थे। दरबार द्वारा नियुक्त संगीतकार सेलरी को ईर्ष्या होने लगी और एक दिन उसने चीख कर कहा कि ऊपर वाले ने सारी प्रतिभा एमेडस मोजार्ट को दी और महत्वाकांक्षा सेलरी को दी, अत: वह इस अन्याय को मिटाने के लिए मोजार्ट का कत्ल कर देगा। प्रतिभाहीन महत्वाकांक्षा अत्यंत हिंसक हो जाती है व जहां से गुजरती है, उधर की हवाएं भी जख्मी हो जाती हैं।

फिल्म में पुत्री के नजरिए से मां का जीवन वृत्त प्रस्तुत है। पुत्री अपनी मां से नाराज है कि उसने अपने पति और बेटी दोनों से अधिक महत्व और समय अपने काम को दिया। प्राय: कर्तव्य के प्रति निष्ठा को गलत समझ लिया जाता है। अपनी प्रतिभा से न्याय के लिए व्यक्ति को माया-मोह का त्याग करना होता है।

फिल्म में प्रस्तुत है कि बेटी मां के खिलाफ कानूनी मुकदमा दायर करती है। उद्देश्य सिर्फ मां से मिलना है, उलाहना देना है। पुत्री को यह जानकर क्रोध आता है कि उसकी मां ने ही अपनी पुत्री से मुलाकात के लिए यह खेल रचा था। फिल्म मानव मस्तिष्क की असीमित क्षमताओं के प्रति आदरांजलि जैसी रची गई है। फिल्म विद्या के आविष्कार के समय दार्शनिक बर्गसन ने कहा था कि यह कैमरा मनुष्य के मस्तिष्क की तरह काम करता है।

आंख लेन्स की तरह फोटोग्राफ लेती है और दिमाग के स्मृति कक्ष में स्थिर चित्र की तरह भेजती है। यह कक्ष स्थिर चित्रों को चलाएमान बनाता है। सुखद संयोग है कि शकुंतला देवी का जीवन चरित्र फिल्म विद्या में प्रस्तुत किया गया है। निर्देशक का कमाल है कि उसने पूरी फिल्म में हास्य को बनाए रखा है।

एक पात्र कहता है कि स्त्रियों को साज-श्रृंगार में व्यस्त रहना चाहिए, गोयाकि गणित पुरुषों का क्षेत्र मान लिया गया। लिंग भेद मानव अवचेतन में हमेशा रेंगने वाला कीड़ा है। विद्या बालन ने शकुंतला देवी की भूमिका प्रभावोत्पादक बना दी है।

ज्ञातव्य है कि विद्या बालन ने ‘द डर्टी पिक्चर्स’ और ‘बेगमजान’ जैसी भूमिकाएं भी बड़ी सहजता से अदा की हैं। विद्या बालन की प्रतिभा का पूरा दोहन किया जाना अभी बाकी है। शकुंतला देवी की भूमिका में उसकी हर मांस पेशी अपेक्षित भावना अभिव्यक्त करती है।



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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक


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