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सिर्फ 500 शब्दों में समझिए बाबरी मस्जिद विध्वंस से लेकर सीबीआई की विशेष कोर्ट के फैसले तक की 28 साल की कहानी

आज से 28 साल पहले 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों की भीड़ ने बाबरी मस्जिद गिराई। उनका दावा था कि यह राम जन्मभूमि पर बनी है। इस जगह पर राम का मंदिर ही बनना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल नवंबर में जमीन के मालिकाना हक से जुड़े केस में इस दावे पर मुहर लगाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राम मंदिर बनाने के लिए 5 अगस्त को भूमिपूजन भी कर दिया है। यानी राम मंदिर बनाने का काम शुरू हो चुका है। पर, बाबरी मस्जिद को गिराया गैरकानूनी था, इस वजह से यह मामला अदालत में था।

6 दिसंबर 1992 को पुलिस ने बाबरी ढांचे को गिराने के मामले में 49 एफआईआर दर्ज की थी। एक एफआईआर हजारों कारसेवकों के खिलाफ थी, जिन्होंने बाबरी मस्जिद गिराई। दूसरी एफआईआर में भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार के साथ-साथ विश्व हिंदू परिषद के नेता आरोपी थे। उन पर भीड़ को उकसाने का आरोप था। 47 एफआईआर पत्रकारों और अन्य लोगों से मारपीट की थी।

यूपी सरकार ने दोनों प्रमुख एफआईआर की जांच 27 अगस्त 1993 को सीबीआई को सौंप दी। 5 अक्टूबर 1993 को सीबीआई ने 48 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट भी पेश कर दी थी। इसमें शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह समेत कई अन्य भी आरोपी बनाए गए थे। सीबीआई ने तीन साल बाद जनवरी 1996 में सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की और कहा कि बाबरी मस्जिद गिराना सुनियोजित साजिश का हिस्सा था।

इसके बाद 14 साल, यानी राम के वनवास के बराबर का समय इस विवाद में बीत गया कि एफआईआर की सुनवाई किस कोर्ट में की जाए। रायबरेली और लखनऊ की अदालतों में मामला ट्रांसफर होता रहा। इस दौरान आरोपी इलाहाबाद हाईकोर्ट भी पहुंचते रहे। 22 मई 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 21 लोगों पर लगे आपराधिक साजिश के आरोप हटाने के आदेश दे दिए। इसके बाद यह केस एक तरह से ठंडे बस्ते में चला गया। 7 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने 19 अप्रैल 2017 को कहा कि सभी केस अब लखनऊ के स्पेशल सीबीआई कोर्ट में सुने जाएंगे। डे-टू-डे बेसिस पर सुनवाई होगी और दो साल में फैसला देना है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी आदेश में आडवाणी और अन्य लोगों के खिलाफ आपराधिक साजिश के आरोप भी फिर से जोड़ दिए।

सही मायनों में इसके बाद ही केस की सुनवाई को रफ्तार मिली। पिछले साल आडवाणी, उमा भारती, मुरली मनोहर जोशी जैसे आरोपियों ने इस मामले में सीबीआई कोर्ट में बयान दर्ज कराए। सुप्रीम कोर्ट की डेडलाइन खत्म हो रही थी तो स्पेशल जज ने दो बार वक्त बढ़ाने की अर्जी लगाई, जिसे सुप्रीम कोर्ट मान गया। जिन जज सुरेंद्र कुमार यादव ने फैसला सुनाया, वे तो पिछले साल 30 सितंबर को ही रिटायर होने वाले थे। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाने के लिए उनकी एक साल नौकरी बढ़ा दी।

इस साल 16 सितंबर को कोर्ट ने कहा कि फैसला 30 सितंबर को सुनाया जाएगा। हुआ भी ऐसा ही। जज यादव ने अपने रिटायरमेंट वाले दिन ही सभी आरोपियों को बरी कर दिया और कहा कि बाबरी मस्जिद गिराने की घटना अचानक हुई। न तो कारसेवकों को इसके लिए वहां बुलाया गया था और न ही नेताओं के कहने पर उन्होंने ढांचा गिराया।



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Babri Masjid Demolition Case Verdict: What is the Babri Masjid issue? Know Complete Fact About Babri Masjid Demolition


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