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ग्रेस और रिचर्ड की कहानियां बताती हैं कि पैसे के प्रबंधन का संबंध इससे नहीं है कि आप क्या जानते हैं, बल्कि आपके गुण और व्यवहार से है

यूपी सरकार 31 अक्टूबर को वाल्मीकि जयंती मनाएगी। इसके लिए राज्य में मौजूद उन जगहों का सौंदर्यीकरण किया जा रहा है, जिनका उल्लेख वाल्मीकि रामायण में है। जिस तरह विभिन्न संदर्भों में दिखाई दीं हनुमान की अनोखी क्षमताओं, जैसे कुशलता, साहस, व्यावहारिकता और वाकपटुता आदि का वर्णन वाल्मिकी रामायण में है, उसे पढ़ने का अलग आनंद है।

याद कीजिए कैसे हनुमान ने रावण के दरबार में खुद को व्यक्त करते हुए, रावण और लंका के भविष्य के प्रति वास्तविक चिंता दर्शायी। उन्हें लगता है कि रावण ने संपत्ति और गुण, तपस्या व आत्मसंयम से पाए। जब कोई दुराचारी हो जाता है तो सद्गुण खो जाते हैं। हनुमान को लगता है कि अपने गुणों से हासिल चीजों का आनंद लेने के बाद अब समय है कि रावण सीता के अपहरण के पाप का नतीजा भुगते।

हनुमान की सलाह से मुझे वॉट्सएप पर आई निवेश की एक कहानी याद आई, जो दुनिया में मशहूर है। यह कहानी ग्रेस ग्रोनर की है, जो 12 साल की उम्र में अनाथ हो गईं। उन्होंने कभी शादी नहीं की, कभी कार नहीं चलाई। वे जीवनभर एक बेडरूम वाले घर में अकेली रहीं और पूरा कॅरिअर बतौर सेक्रेटरी बिताया। वे हर मायने में एक अच्छी महिला थीं। लेकिन उन्होंने विनम्र जीवन जिया। जब 2010 में 100 वर्ष की उम्र में उनका देहांत हुआ, तो वे दान में 70 लाख डॉलर (तब करीब 31.5 करोड़ रु.) छोड़ गईं। इसने सभी को चौंकाया। उन्हें जानने वाले पूछ रहे थे, ‘ग्रेस को इतना पैसा कैसे मिला?’

लेकिन यह कोई राज नहीं था। न ही पैतृक संपत्ति थी। ग्रेस अपनी मामूली तन्ख्वाह में से थोड़ी-थोड़ी बचत करती रहीं और उन्हें स्टॉक मार्केट में 80 साल तक चक्रवृद्धि बढ़त का लाभ मिला, जिसे उन्होंने हाथ नहीं लगाया। बस यही बात थी।

ग्रेस के निधन के हफ्तों बाद निवेश की एक अन्य कहानी आई। मेरिल लिंच की लैटिन अमेरिकी डिविजन के पूर्व वाइस चेयरमैन रिचर्ड फसकोन ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया। वे अपने दो घरों के फोरक्लोजर के लिए लड़ रहे थे, जिनमें 20 हजार वर्गफीट में बने एक घर का मॉर्टगेज (ऋण) 66,000 डॉलर प्रतिमाह था।

फसकोन, ग्रेस गोनर से विपरीत थे। हावर्ड और शिकागो विश्वविद्यालय से पढ़ाई के बाद वे निवेश उद्योग में इतने सफल हुए कि लगभग 40 की उम्र में रिटायरमेंट ले लिया, ताकि ‘अपनी निजी और परोपकार संबंधी रुचियां पूरी कर सकें’। लेकिन वे अत्यधिक उधार और गैर-नकदी निवेशों में उलझ गए। जिस साल ग्रेस ने ढेर सारा पैसा दान किया, उसी साल रिचर्ड ने जज के सामने कहा, ‘मैं वित्तीय संकट से टूट चुका हूं… मेरी पत्नी जो निजी साजो-सामान बेच पाएगी, वही मेरी नकदी का एकमात्र स्रोत है।’

इन कहानियों का उद्देश्य यह कहना नहीं है कि आप ग्रेस जैसे बनें और रिचर्ड जैसे नहीं। बिना शिक्षा, जरूरी अनुभव, साधन और संपर्कों के ग्रेस ने सर्वश्रेष्ठ शिक्षा, अनुभव, साधन और संपर्क वाले को पीछे छोड़ दिया। दरअसल निवेश केवल वित्त का अध्ययन नहीं है। यह इसका अध्ययन है कि लोग पैसों से कैसा व्यवहार करते हैं। और बहुत होशियार लोगों तक को व्यवहार सिखाना मुश्किल है।

आप व्यवहार को किसी फॉर्मूले से याद नहीं करवा सकते या स्प्रैडशीट पर मॉडल नहीं बना सकते। व्यवहार जन्मजात होता है, सभी में अलग-अलग होता है, उसे मापना मुश्किल है, यह बदलता रहता है और लोग अक्सर इसके अस्तित्व को नकारते हैं, खासतौर पर जब वे खुद की व्याख्या करते हैं।

लेकिन आमतौर पर वित्त ऐसे नहीं सिखाया जाता। वित्त उद्योग इसपर बहुत बात करता है कि क्या करना चाहिए, लेकिन इसपर पर्याप्त बात नहीं होती कि तब हमारे दिमाग में क्या होता है, जब हम उसे करने की कोशिश करते हैं।

फंडा यह है कि ग्रेस और रिचर्ड की कहानियां बताती हैं कि पैसे के प्रबंधन का संबंध इससे नहीं है कि आप क्या जानते हैं, बल्कि आपके गुण और व्यवहार से है।



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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु


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