ज्या दातर लोग हमारे देश में विस्तृत रेल नेटवर्क बनाने का श्रेय अंग्रेजों को देते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि तत्कालीन शासकों ने कभी वहां रेलवे नेटवर्क नहीं बनाया, जहां संबंधित राजा मजबूत थे। उदाहरण के लिए कोंकण बेल्ट, जहां शिवाजी और उनका वंश मजबूत प्रतिद्वंद्वी थे या कर्नाटक और तमिलनाडु के कुछ हिस्से, जहां एक और मजबूत प्रतिद्वंद्वी टीपू सुल्तान थे।
इंफ्रास्ट्रक्टर की गैर-मौजूदगी का सीधा नतीजा यह हुआ कि स्थानीय लोग हमेशा सड़कमार्ग से आते-जाते हैं और इसीलिए कुछ जगहों पर रोड इंफ्रास्ट्रक्चर, रेलवे की तुलना में मजबूत नजर आता है। लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर, अगली पीढ़ी के कुछ लोगों के लिए ट्रेन देखना अब भी दुर्लभ है।
तमिलनाडु के पुडुक्कोट्टई जिले में ग्रामीण स्कूल के बच्चों का ऐसा ही एक समूह था। लॉकडाउन के ठीक पहले स्कूल के हेडमास्टर एस एंटोनी को यह जानकर हैरानी हुई कि 230 छात्रों में से बहुत कम छात्रों ने रेल यात्रा की थी। इसलिए उन्होंने 2020 ग्रीष्मावकाश के दौरान उन्हें रेल यात्रा पर ले जाने का फैसला लिया। लेकिन जब अचानक हुए लॉकडाउन ने योजना को पटरी से उतार दिया तो एंटनी ने बच्चों को स्कूल में ही ट्रेन का अहसास देने का फैसला लिया।
एंटनी और उनके शिक्षकों ने लॉकडाउन की अवधि का उपयोग करते हुए स्कूल की दीवारों को ट्रेन जैसा दिखाने के लिए उन्हें रंगने का फैसला लिया। हेडमास्टर के साथ कुछ शिक्षकों ने गलियारे की 80 फीट दीवार को ट्रेन जैसा रंगने के लिए 12,000 खर्च किए। इसे पूरा करने में एक महीना लगा। इन्हीं में शामिल स्कूल के ड्रॉइंग शिक्षक आर राजेंद्रन ने ट्रेन से जुड़ी हर बारीकी को शामिल करने का प्रयास किया, ताकि पेंटिंग बिल्कुल असली जैसी लगे।
हर बोगी को नंबर दिया है, इमरजेंसी खिड़की है, ट्रेन की नेमप्लेट और उसका नंबर है और सीट नंबर भी लिखे हैं। यह न सिर्फ मौजूदा छात्रों के लिए चौंकाने वाला था, बल्कि इसने दसवीं के उन छात्रों को भी चौंकाया, जो इस शनिवार नेशनल टैलेंट सर्च एग्जामिनेशन में पंजीकरण के लिए स्कूल पहुंचे थे। उन्होंने ऐसी सेल्फी भी खिंचवाईं, जैसे वे ट्रेन में चढ़ रहे हों या ट्रेन के सामने प्लेटफॉर्म पर कुछ खरीदने खड़े हों।
बड़ा अंतर लाने वाली ऐसी ही साधारण घटना का अनुभव मुझे इस रविवार को हुआ। मैं सड़क किनारे सब्जीवाली के पास मोरिंगा (सहजन या ड्रमस्टिक) छांट रहा था। जब मेरा ध्यान सब्जी पर था, उसने मुझसे पूछा, ‘मेमसाब घर पर हैं या आप खाना बनाएंगे?’ मैंने तोलने के लिए मोरिंगा देते हुए कहा, ‘हां, वो घर पर हैं।’ दुकानदार तुरंत बोली, ‘साहेब, आपको मोरिंगा छांटना नहीं आता। मैं छांट देती हूं। आपको मोटी वाली लेनी चाहिए, जो थोड़ी भरी हुई हों, लेकिन साथ ही यह देखना चाहिए कि वे ताजी और थोड़ी मुलायम हों।
यह मुश्किल नहीं है।’ उसने मेरी छांटी गई मोरिंगा अलग कर दीं और खुद अपने मुताबिक अच्छी छांटकर दीं। घर पहुंचा जो मेरी पत्नी बोली, ‘तीन दशक में पहली बार आप अच्छी मोरिंगा लाए हैं।’ यकीन मानिए, मैंने दिल से उस सब्जीवाली को धन्यवाद दिया और मेरे होठों ने उसे दुआएं दीं। मेरे दिमाग ने मुझसे कहा कि अब मुझे हमेशा उसी से सब्जी लेनी चाहिए।’ उसके इस साधारण, परवाह वाले व्यवहार ने उसे जीवनभर का ग्राहक दे दिया।
फंडा यह है कि किसी की जिंदगी में अंतर लाने के लिए आपको बहुत होशियार, अमीर, खूबसूरत या पर्फेक्ट होने की जरूरत नहीं है। आपको बस परवाह करने की जरूरत है। कुछ बड़ा नहीं, बस थोड़ा-सा हटकर कुछ करके देखिए, आप कई दिल जीत लेंगे।
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