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हमारे देश पर ‘एजिज़्म’ को हावी न होने दें, संकट में बुजुर्गों की बद्धिमत्ता और अनुभव ही काम आते हैं

सा गर, मध्य प्रदेश की अर्चना दुबे ने बतौर प्राइमरी टीचर 38 साल, दो महीने और 25 दिन नौकरी की और 31 मार्च 2020 को रिटायर हुईं। वे किसी और ऊंचे स्तर पर जा सकती थीं लेकिन वे हमारे पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय डॉ एपीजे अब्दुल कलाम की बात पर विश्वास करती थीं।

डॉ कलाम ने यह बात मुझसे एक संवाद में भी दोहराई थी कि एक बच्चे के चरित्र निर्माण में तीन लोगों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है, जिसमें शामिल हैं मां, पिता और प्राइमरी शिक्षक। अर्चना भी इस पर विश्वास करती थीं। वे एक साथ दो चीजों में योगदान दे रही थीं। वे जिन बच्चों के संपर्क में आती थीं, उन्हें ज्ञान देने के साथ उनके चरित्र का आधार भी तैयार कर रही थीं।

अपने कॅरिअर की शुरुआत 150 रुपए प्रतिमाह वेतन से करने वाली अर्चना का ट्रांसफर कई छोटे-छोटे गांवों में हुआ। उन्होंने वहां जाकर बच्चों का पढ़ाया जहां आमतौर पर उन जैसे अच्छे शिक्षक जाना नहीं चाहते। वे रोजाना उन छोटे-छोटे गांवों का सफर करती थीं और मौसम की मार झेलते हुए भी जनगणना तथा सर्वे जैसे हर सरकारी काम में शामिल होती थीं।
अब आते हैं 31 मार्च 2020 पर। कम से कम इस दिन तक तो उन्हें जानकारी नहीं दी गई थी कि वे रिटायर हो रही हैं। स्वाभाविक है कि लॉकडाउन की वजह से उनका विदाई समारोह भी नहीं हुआ था। कुछ समय बाद उन्हें वॉट्सएप पर रिटायर होने का लेटर मिला। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उनकी मशक्कत तो अब शुरू होगी। पिछले नौ महीनों से उन्हें पेंशन नहीं मिली है, न ही अन्य सेटलमेंट हुए हैं।

लॉकडाउन के बाद से पिछले 6 महीनों में उन्होंने और उनके पति ने संबंधित कार्यालय के चक्कर लगाए लेकिन बिना ‘लाभ’ (आप इसका अर्थ समझ सकते हैं) के कोई काम नहीं करना चाहता था। कुछ अधिकारी कहते थे कि वे खुशकिस्मत हैं कि कुछ ही महीनों में कागजी कार्यवाही होने लगी, वरना कई ऐसे लोग हैं, जिन्हें पांच-पांच साल पेंशन नहीं मिलती।

याद रखें कि आज तक अर्चना के खाते में पेंशन का पैसा नहीं आया है। जब उन्होंने सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत की तो अधिकारी नाराज हो गए और कहने लगे कि लाभ पाने के लिए शिकायत वापस ले लो।
यह सिर्फ अर्चना दुबे की कहानी नहीं है, उन जैसे सैकड़ों लोग हैं जो रिटायरमेंट के बाद मदद करने वाली पेंशन, पीएफ और पीपीएफ पाने के लिए संघर्ष करते हैं। यह उनका ही पैसा होता है जो मुश्किल वक्त में काम आता है। कहीं न कहीं हमारे अधिकारियों, फिर वे सरकारी हों या गैर-सरकारी, की राय इसपर कुछ अलग होती है।

सभी का न सही, पर ज्यादातर का रवैया ‘एजिज़्म’ वाला ही रहता है। और यह रवैया तेजी से फैल रहा है। ‘एजिज़्म’ ऐसी प्रवृत्ति है जिसमें बुजर्गों को ध्यान के लायक न समझकर कमजोर मानते हैं। यह रवैया कुछ बहुओं में सास-ससुर के खिलाफ, बड़े पद पर बैठे जूनियर्स में उन सीनियर्स के खिलाफ देखा जा सकता है, जिन्होंने उन संगठनों का निर्माण तब किया था, जब ये जूनियर्स आए भी नहीं थे। फेहरिस्त बहुत लंबी है।
बतौर युवा राष्ट्र हमें बुजुर्गों के साथ सम्मान पूर्वक व्यवहार करने के लिए एक साझा दयालुता और शिष्टता में निवेश की जरूरत है। दुर्भाग्य से, बुजुर्गों के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार करने की बजाय हम उन्हें और समाज व राष्ट्र के निर्माण में उनके योगदान को नकार देते हैं।
फंडा यह है कि हमारे देश पर ‘एजिज़्म’ को हावी न होने दें। संकट में बुजुर्गों की बद्धिमत्ता और अनुभव ही काम आते हैं, यहां तक कि सरकार के लिए भी।



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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु


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