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फिल्म निर्देशकों की अभिनय प्रतिभा दवा भी हो सकती है और कभी-कभी ये रोग भी हो जाता है

फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप ने सोनाक्षी सिन्हा अभिनीत ‘अकीरा’ में नकारात्मक भूमिका प्रभावोत्पादक ढंग से प्रस्तुत की थी। प्रकाश झा ने फिल्म ‘सांड की आंख’ में नकारात्मक भूमिका, चरित्र के गंवारपन पर अभिमान करने वाले पात्र को अभिनीत किया। निर्देशक तिग्मांशु धूलिया ने फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में नकारात्मक भूमिका को यादगार बना दिया। इस तरह तीन निर्देशकों ने अपनी अभिनय प्रवीणता को प्रस्तुत किया।
कुछ निर्देशक कलाकार को सीन समझा देने के बाद उसे यह स्वतंत्रता देते हैं कि वे इसे अपने ढंग से प्रस्तुत करें। कुछ निर्देशक सीन अभिनीत करके दिखाते हैं और यह चाहते हैं कि कलाकार इसी ढंग से अभिनय करे। इस शैली में यह खतरा निहित है कि सारे कलाकार एक सा अभिनय करते हुए लग सकते हैं। दोनों ही शैलियों में अभिनय करते समय कलाकार अपने स्वयं के तरीके से अभिनय कर सकता है। अभिनय में इसे इंप्रोवाइजेशन कहते हैं। मनोज कुमार अपनी फिल्म ‘क्रांति’ में दिलीप कुमार को सीन सुना कर यह स्वतंत्रता देते थे कि वे उसे अपने ढंग से प्रस्तुत करें। इसी फिल्म में मनोज कुमार भी अभिनय कर रहे थे मनोज हू-ब-हू दिलीप की तरह करने लगे। इस तरह एक शैली की परछाईं प्रस्तुत होने से दिलीप नाराज़ थे। उन्होंने यह रास्ता निकाला की रिहर्सल के समय वह मनोज कुमार के बताए ढंग से अभिनय करते, परंतु शूटिंग के समय अपनी शैली इतनी बदल देते थे कि मनोज के लिए उसकी परछाईं अभिनीत करना असंभव हो जाता था।
हॉलीवुड के फिल्मकार हिचकॉक अपनी फिल्म में कुछ क्षण एक सीन अभिनीत करते थे। इसी तर्ज पर सुभाष घई भी अपनी फिल्मों में नजर आए। सुभाष ने पुणे फिल्म संस्थान में अभिनय का भी प्रशिक्षण लिया था परंतु दो प्रयास के बाद घई ने तय किया कि उन्हें सिर्फ फिल्म निर्देशित करना चाहिए। हिचकॉक की तरह घई महज झलक दिखाते थे।
गुरुदत्त ने प्रयास किया था कि ‘प्यासा’ में दिलीप कुमार अभिनय करें। परंतु उन दिनों दिलीप अपने डॉक्टर के परामर्श पर चलते हुए गंभीर भूमिका नहीं करना चाहते थे। लगातार कई त्रासदीय भूमिकाओं में अभिनय के कारण उनके मन में नैरश्य उत्पन्न हो गया था। इससे बचने के लिए उन्होंने ‘आजाद’ ‘राम और श्याम’ अभिनीत कीं। अभिनय दवा भी हो सकता है और कभी-कभी ये रोग भी हो जाता है। एक दौर में महिला कलाकार दावतों में शीतल पेय में शराब मिलाकर पीती थीं ताकि उनकी छवि साफ-सुथरी रहे। मध्यम वर्ग के जीवन मूल्यों में महिला का शराब पीना उचित नहीं समझते थे। स्वाभाविक अभिनय करने वाले मोतीलाल ने ‘छोटी-छोटी बातें’ नामक फिल्म भी बनाई थी। मध्यम आय वर्ग में सेवानिवृत्त व्यक्ति के प्रति सम्मान की भावना घट जाती है। राज कपूर की निर्देशक के रूप में ख्याति इतनी बढ़ रही थी कि कलाकार राज कपूर अनदेखे ही रह गए। शैलेंद्र की ‘तीसरी कसम’ में गाड़ीवान हीरामन की भूमिका उनकी श्रेष्ठतम रही है। आमिर खान ने फिल्में डायरेक्ट की हैं। परंतु उनकी ‘लगान’ और ‘दंगल’ में उनका कमाल का अभिनय भी उन्होंने किया है। एक निर्देशक को फोटोग्राफी और सज्जा, ध्वनि मुद्रण इत्यादि सभी विभागों की जानकारी होना जरूरी है। सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानव चेतन और सामाजिक यथार्थ का अनुभव होना।



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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक


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